🏠 एक छत... पसीने से बनी कहानी | ग्राम पेंड्री हसौद के मेहनती हाथों का सलाम
जब कोई नया घर बनता है, तो लोग कहते हैं – "बधाई हो! नया घर बन रहा है!"
लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं, कि उस छत को ढालने में कितने पसीने की बूंदें गिरी हैं।
हमारे गांव पेंड्री हसौद से आए हेतराम साहनी और उनकी टीम – जिनके हाथों ने मेरे घर की छत को हकीकत में ढाला, आज उनका नाम लेना मेरा फर्ज़ है।
👷♂️ हर एक लेबर का योगदान:
इन मजदूरों ने तेज़ धूप में खड़े रहकर, बेलचे से मसाला उठाया, कंधे पर भारी बाल्टियाँ उठाईं, और बिना शिकायत – बिना थके – पूरा दिन एक ईंट से दूसरी ईंट तक जिंदगी जोड़ दी।
उनका पसीना, हमारे सपनों की नींव बना।
लेकिन अफ़सोस...
इतनी मेहनत के बाद भी –
इन मजदूरों को सही मजदूरी नहीं मिलती।
काम पूरा होता है, लेकिन मेहनत की कीमत अधूरी रह जाती है।
🔨 मेरा भाई – चैतराम कुर्रे
इस छत को खड़ा करने में मेरे भाई चैतराम कुर्रे का भी अहम योगदान है। नींव की खुदाई से लेकर छत की ढलाई तक, उसके हाथों ने हर जिम्मेदारी उठाई।
वो नया उथाने मिस्त्री भी बना, कारपेंटर भी बना, जो चाहिए था वो बना – क्योंकि वो जानता है – सपनों को सिर्फ देखा नहीं जाता, बनाया जाता है।
रात को भी काम, दिन को भी काम – कभी खुद की नींद भुलाकर, कभी दूसरों का आराम बनकर…
🙏 इन सबको मेरा सलाम
यह घर सिर्फ मेरा नहीं है –
यह पेंड्री हसौद के मजदूरों,
हेतराम साहनी,
चैतराम कुर्रे,
और हर उस हाथ का है जिसने इसे छत दी, दीवार दी और पहचान दी।
इन मेहनती लोगों को दिल से सलाम, जिन्होंने हमारे सपनों को ईंट और सीमेंट में बदल दिया।
🏚️ एक छत – मजदूर के पसीने से बनी, पर उसकी अपनी नहीं...
गांव पेंड्री हसौद से आए कुछ सच्चे मेहनतकश हाथ,
जिनकी पहचान सिर्फ उनका पसीना, और काम सिर्फ "ढलाई" कहलाता है।
👷♂️ सुबह सूरज से पहले उठते हैं...
ना अलार्म होता है, ना चाय का इंतज़ार।
सिर्फ एक बेलचा, एक गमछा, और कंधे पर एक ज़िम्मेदारी।
हेतराम साहनी और उनके साथी मजदूर
हर दिन दूसरे के लिए घर बनाते हैं —
कभी छत ढालते हैं, कभी दीवारें खड़ी करते हैं।
लेकिन…
खुद के सिर पर छत नहीं होती।
🔨 रात भर काम, दिन भर धूप...
इन मजदूरों ने हमारे घर की छत ढालते समय
तेज़ धूप में जलते हुए
कभी बाल्टी उठाई, कभी मिक्सर मशीन संभाली,
तो कभी सीधे सर पर मसाला उठाकर सीढ़ियाँ चढ़ीं।
💧 पसीना टपकता रहा, लेकिन उन्होंने रुकना नहीं जाना।
कभी-कभी तो
भूखे पेट भी छत डाली जाती है।
क्योंकि उनके लिए “काम रुक गया”
मतलब “रोज़ की रोटी छिन गई…”
💔 मजदूरी का भी नहीं मिलता पूरा हक…
कई बार ढलाई पूरी होने के बाद
मालिक लोग पैसे देने में देरी करते हैं,
या फिर पूरा भुगतान नहीं करते।
पर मजदूर क्या कहे?
उसका गुस्सा भी “शांति” में दबा रहता है…
और दर्द… सिर्फ उसकी बीवी और बच्चे जानते हैं।
👨🔧 चैतराम कुर्रे – मेरा भाई, मेरा गर्व
इस छत को खड़ा करने में
मेरे भाई चैतराम कुर्रे ने
मिस्त्री, नया उथाने वाला, और कारपेंटर —
हर भूमिका निभाई।
दिन में छत ढालता,
रात को दरवाजे और खिड़की की चौखटें गढ़ता,
बिना आराम लिए, सिर्फ एक मकसद से:
“मेरा घर खड़ा हो,
लेकिन किसी की मेहनत अधूरी ना रह जाए…”
🙏 ये सिर्फ एक छत नहीं है…
ये उन हाथों की पहचान है,
जिन्होंने कभी अपने लिए नहीं —
हमारे लिए ईंटें जोड़ीं।
मजदूर छोटा नहीं होता,
उसकी कहानी सिर्फ लिखी नहीं जाती — महसूस की जाती है।
📝 लेखक:
✍️ Rukdhan Kurre
🎬 Director, Cameraman, Editor – Multitalent Music Studio
📍 स्थान: ग्राम मरघट्टी, छत्तीसगढ़